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सैंड फ्लाई क्या है, जो गुजरात में बच्चों के लिए जानलेवा बनी
- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
हिम्मतनगर के पीआईसीयू में संदिग्ध चांदीपुरा वायरस से पीड़ित ईशा असारी का इलाज चल रहा है. उनके बुज़ुर्ग दादा-दादी अस्पताल के बाहर बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.
यहाँ अस्पताल के अधिकतर बिस्तर ख़ाली हैं, लेकिन जिन बिस्तरों पर बच्चे भर्ती हैं, उन्हें वेंटिलेटर की ज़रूरत है. ईशा जैसी ही स्थिति अस्पताल में भर्ती तीन साल की जानकी परमार की भी है.
जानकी के परिवार वाले इस उम्मीद में हैं कि उनकी बच्ची फिर से हँसने-खेलने लगे.
ये दोनों ही बच्ची एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से पीड़ित हैं.
इनमें से कुछ मामलों में चांदीपुरा वायरस की पुष्टि हुई है. यह वायरस सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) नामक एक छोटे कीट के काटने से शरीर में प्रवेश करता है.
गुजरात के इन गांवों में क्या हो रहा है?
यह वायरस फ़िलहाल गुजरात के गांधीनगर, साबरकांठा, खेड़ा, अरावली और पंचमहाल ज़िलों में संदिग्ध मामलों के रूप में सामने आया है.
यह वायरस मुख्य रूप से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) के काटने से फैलता है. वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद बच्चे को तेज़ बुखार, उल्टी, दस्त, ठंड लगना और शरीर में ऐंठन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे लक्षण दिखाई देने पर बच्चे को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए. अगर इलाज में देरी होती है तो बच्चे की स्थिति गंभीर हो सकती है.
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने बताया, "अब तक गुजरात में सात बच्चों में चांदीपुरा वायरस की पुष्टि हुई है, जिनमें से तीन बच्चों की मौत हो चुकी है जबकि चार बच्चों का इलाज चल रहा है."
यह देखा गया कि गांवों में कुछ परिवार मेडिकल इलाज कराने से पहले बच्चों को स्थानीय झाड़-फूंक करने वाले तांत्रिक के पास ले जाते हैं. इससे इलाज में देरी हो जाती है और बच्चे की तबीयत और अधिक बिगड़ जाती है.
इसी वजह से ईशा असारी को भी समय पर इलाज नहीं मिल सका. उसकी तबीयत ख़राब होने के बाद पहले गांव के दो अलग-अलग 'भूवा' के पास ले जाया गया. जब उसकी हालत और गंभीर हो गई, तब आखिरकार उसे हिम्मतनगर के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया.
कलजीभाई बताते हैं कि जब वे खेत से अपने बैलों के साथ घर लौटे, तब उन्होंने देखा कि ईशा बिस्तर पर सो रही थी. वे अभी बैठे ही थे कि ईशा अचानक जोर-जोर से "मम्मी... मम्मी... मम्मी..." कहकर रोने लगी.
उन्होंने कहा, "हमें पहले लगा कि उस पर किसी आत्मा का साया है, इसलिए हम उसे एक 'भूवा' के पास ले गए. लेकिन जब उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी, तब हम उसे अस्पताल लेकर गए."
अब कलजीभाई अपनी पोती के आंखें खोलने और फिर से उनसे बात करने का इंतजार कर रहे हैं.
दो साल की आकृति की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. सात जुलाई को उसकी तबीयत खराब हुई. उसे तेज बुखार आया और उल्टियां होने लगीं. उसे साबरकांठा से हिम्मतनगर के सिविल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन 24 घंटे के भीतर उसकी हालत बहुत गंभीर हो गई और उसकी मौत हो गई.
आकृति के पिता गोहिल परमार ने बीबीसी गुजराती से कहा, "मुझे उसकी बहुत याद आती है. वह मेरी इकलौती बेटी थी और हमेशा मेरे साथ रहती थी. हमें यह समझने का मौक़ा भी नहीं मिला कि उसे क्या हुआ है. तब तक उसकी हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि उसकी मौत हो गई."
गोहिल ने बताया कि उन्होंने चांदीपुरा वायरस के बारे में पहली बार अब सुना है.
चांदीपुरा वायरस इस गांव में कैसे फैल रहा है?
हालांकि केवल दवा या इलाज ही पर्याप्त नहीं है. चांदीपुरा वायरस पर नियंत्रण के लिए लोगों में पर्याप्त जागरूकता, स्वच्छता बनाए रखना और बारिश के बाद तुरंत कीटनाशकों का छिड़काव करना भी ज़रूरी है.
बीबीसी की टीम चार अलग-अलग गांवों में गई, जिनमें साबरकांठा का देमतीमेरा, अरावली के मेरी टींबा और जालमपुर, राजस्थान के खेरवाड़ा का बाबरी गांव शामिल हैं.
ये चारों गांव अलग-अलग ज़िलों में स्थित हैं, लेकिन इनमें कई समानताएं हैं. यहाँ मिट्टी के घर, दीवारों में दरारें, गाय-बकरियों के बाड़े, घरों के पास कच्चे आंगन और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से काफ़ी दूर बसे गांव हैं. इन गांवों के अधिकांश पुरुष मज़दूरी के लिए बाहर चले जाते हैं.
जब छह वर्षीय राजकुमार डामोर की तबीयत बिगड़ी, तब आधी रात को उनकी मां पारुलबेन उसे कंधे पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलीं. इसके बाद ही वे एंबुलेंस तक पहुंच सकीं. उस समय राजकुमार के पिता मुकेशभाई मज़दूरी के लिए ईडर में थे.
पारुलबेन बताती हैं, "राजकुमार स्कूल से घर आया. इसके बाद वह बिस्तर पर बैठा रहा. उसने अपना होमवर्क किया, वहीं खाना खाया और सो गया. अचानक रात में उसे उल्टियां होने लगीं. मुझे कुछ समझ आता, उससे पहले ही उसे दौरे पड़ने लगे."
राजकुमार को पहले भीलोडा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) ले जाया गया. लेकिन वह बेहोश था, इसलिए वहां से उसे हिम्मतनगर रेफर कर दिया गया. दुर्भाग्य से दोपहर क़रीब 12 बजे तक उसने दम तोड़ दिया.
इन गांवों में चांदीपुरा वायरस के प्रति जागरूकता की भारी कमी देखने को मिली. कई लोगों ने बीबीसी गुजराती से कहा कि उन्हें यह तक नहीं पता कि सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) क्या होती है या यह बीमारी कैसे फैलती है.
चाहे आकृति के पिता गोहिलभाई हों, राजकुमार के पिता मुकेशभाई हों या उनके परिवार के अन्य सदस्य, अधिकांश लोगों को अब तक यह जानकारी नहीं है कि सैंड फ्लाई के प्रजनन को कैसे रोका जा सकता है या उससे बचाव के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए.
राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कई गांवों से सैंड फ्लाई के सैंपल जमा किए हैं. इसके साथ ही उन क्षेत्रों में मौजूद अन्य पशुओं, जैसे गाय, बिल्ली और कुत्तों के भी सैंपल लिए गए हैं.
दरअसल, जिन बच्चों की मौत हुई, उनमें से सभी की जांच रिपोर्ट में चांदीपुरा वायरस की पुष्टि नहीं हुई थी. उनकी मौत का कारण एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) भी हो सकता है.
एईएस एक क्लिनिकल सिंड्रोम है, यानी मस्तिष्क में सूजन से जुड़े लक्षणों का एक समूह. इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें चांदीपुरा वायरस भी एक प्रमुख कारण है.
साबरकांठा और अरावली ज़िलों के आदिवासी इलाक़ों में इस तरह के मामले अपेक्षाकृत अधिक सामने आ रहे हैं.
साबरकांठा के मुख्य ज़िला स्वास्थ्य अधिकारी (सीडीएचओ) डॉ. राजकुमार सुतरिया ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "इस क्षेत्र के गांवों में मिट्टी के घर होते हैं, जिनकी दीवारों में स्वाभाविक रूप से दरारें पड़ जाती हैं. इसके अलावा जहां गायों के बाड़े और मिट्टी के आंगन होते हैं, वहां भी सैंड फ्लाई आसानी से प्रजनन कर सकती है."
उन्होंने आगे कहा, "बारिश के बाद जब मिट्टी की दीवारों में नमी आ जाती है, तो उन दरारों में सैंड फ्लाई के प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं. यह मक्खी सामान्य घरेलू मक्खी से आकार में काफी छोटी होती है."
सावधानी के तौर पर राज्य सरकार ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए राज्य के लगभग 61 क्षेत्रों में नियंत्रण अभियान तेज कर दिया है. इसके तहत चिह्नित हॉटस्पॉट इलाकों में बड़े पैमाने पर कीटनाशकों का छिड़काव किया जा रहा है.
चांदीपुरा वायरस के रोकथाम के लिए क्या क़दम उठाए जा रहे हैं?
इस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की एक अपील के अनुसार, चांदीपुरा वायरस का मुख्य वाहक सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) है.
हालांकि, कुछ मामलों में यह मच्छर जैसे खून चूसने वाले कीड़ों के काटने से भी फैल सकता है.
वहीं, स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने अपील की है कि अगर किसी बच्चे में बुखार, उल्टी या दौरे जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाकर जांच करवानी चाहिए.
राज्य के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी), अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिए गए हैं कि चांदीपुरा वायरस के संदिग्ध किसी भी बच्चे की तुरंत जांच की जाए.
उन्होंने यह भी बताया, "जहां-जहां मरीज़ मिले हैं, वहां स्वच्छता बनाए रखने के लिए अभियान चलाया जा रहा है और वायरस फैलाने वाली मक्खी को नष्ट करने के लिए कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है. इसके अलावा, इलाज के लिए जरूरी दवाओं का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है."
2024 में चांदीपुरा वायरस ने 28 बच्चों की जान ले ली थी
यह पहली बार नहीं है जब चांदीपुरा वायरस के कारण राज्य में बच्चों की मौत हुई हो. साल 2024 में इस वायरस ने काफी कहर बरपाया था.
अगस्त 2024 में स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था, "गुजरात में चांदीपुरा वायरस समेत अन्य के कारण होने वाले वायरल इन्सेफेलाइटिस के 164 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें 101 बच्चों की मौत हुई थी. इनमें से 28 'मुझे उसकी बहुत याद आती है, वो मेरी इकलौती बेटी थी' , गुजरात के इन गांवों में इस वायरस से क्यों डरे हैं लोग
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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