सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी में अब इतना फ़र्क़ क्यों दिख रहा है, नड्डा के हाथों अनशन तोड़ने पर सवाल

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सोनम वांगचुक को जब दिल्ली पुलिस ने 18 जुलाई को जंतर मंतर से जबरन उठाकर सफ़दरजंग हॉस्पिटल में शिफ़्ट किया तो उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने तीखी नाराज़गी व्यक्त की थी.
गीतांजलि ने कहा था कि बिना सहमति के मुँह या नसों के ज़रिए सोनम को कुछ भी नहीं दिया जाए.
लेकिन एक दिन बात ही गीतांजलि ने कहना शुरू कर दिया कि अगर उनसे नेता मिलते हैं और संसद में शिक्षा सुधार के मुद्दे को उठाते हैं तो सोनम वांगचुक अनशन तोड़ देंगे. गीतांजलि ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग भी नहीं दोहराई थी.
आख़िरकार गुरुवार आधी रात सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ा और तुड़वाया सरकार के दो मंत्रियों ने, जबकि पुलिस पर प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पेलेट गन इस्तेमाल का आरोप लग रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने दो तस्वीरें एक्स पर पोस्ट की हैं. एक में सोनम वांगचुक का अनशन जेपी नड्डा तुड़वा रहे हैं और दूसरी तस्वीर में जंतर मंतर पर बैठे नौजवान प्रदर्शनकारियों की भूख हड़ताल अभिनेत्री शबाना आज़मी और आरजेडी सांसद मनोज झा तुड़वाते दिख रहे हैं.
उर्मिलेश ने इस तस्वीर के साथ कैप्शन में लिखा है- कई मौक़ों पर तस्वीरें ख़ुद ही बोलती हैं, अपना भेद खोलती हैं!
न्यूज़ और विश्लेषण वेबसाइट द वायर के संस्थापक एमके वेणु ने एक्स पर लिखा है, ''इसका अच्छा संदेश नहीं जा रहा है. सोनम वांगचुक अपना उपवास तुड़वाने के लिए किसी तटस्थ व्यक्ति को बुला सकते थे या फिर सीजेपी के किसी प्रतिनिधि से ही उपवास तुड़वाते.''
जाने-माने गीतकार स्वानंद किरकिरे ने एक्स पर लिखा है, ''एनएसए लगाया फिर हटाया, फिर बिठाया फिर उठाया फिर पानी पिलाया. कम से कम ये काम तो बच्चों के बीच जा कर करते.''
सोनम वांगचुक और सीजेपी की सोच के बीच बढ़ते फ़र्क़ को भी लोग रेखांकित कर रहे हैं.
एमके वेणु ने लिखा है, ''वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देने के बजाय जंतर-मंतर पर बैठना चाहिए था. यह दिलचस्प है क्योंकि सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने राहुल गांधी के धरने का स्वागत करते हुए कहा था कि अगर वह सीजेपी की मांगों के समर्थन में है, तो जंतर-मंतर हो या कोई और जगह, विरोध का हर मंच समान रूप से स्वीकार्य है.''

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दोनों की सोच में बढ़ता फ़र्क़
एमके वेणु लिखते हैं, ''सीजेपी ने इस मुद्दे पर सोनम वांगचुक से भी अलग रुख़ अपनाया. वांगचुक ने बीजेपी के मंत्रियों से बातचीत के दौरान कहा था कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के मुद्दे पर संसद में चर्चा के दौरान विचार किया जा सकता है. वहीं सीजेपी का कहना है कि पहले धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें, उसके बाद ही आगे की प्रक्रिया हो.''
राहुल गांधी के धरने को लेकर गीतांजलि ने इंडिया टुडे के शो में राजदीप सरदेसाई से कहा था, ''प्रधानमंत्री आवास के बाहर हुए विरोध प्रदर्शन को लेकर हर कोई जानता है कि उसमें गंभीरता की कमी थी. यह ज़्यादा ईमानदार होता अगर यह जंतर-मंतर पर हाथ मिलाकर किया गया होता. इसलिए, अब जनता को और मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है. यह एक जागरूक भारत है.''
जंतर-मंतर से हटने के बाद हॉस्पिटल में सोनम वांगचुक की मुलाक़ात सरकार के प्रतिनिधियों से होती रही लेकिन सीजेपी के प्रतिनिधियों से मुलाक़ातें की कोई तस्वीर सामने नहीं आई.
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके भूख हड़ताल तोड़ने की अपील कर रहे थे लेकिन जेपी नड्डा के हाथों तोड़ेंगे, इसका अंदाज़ा उन्हें था या नहीं, इस पर सीजेपी ने कुछ नहीं कहा है.
इसी हफ़्ते सोमवार को सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका ने केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से मुलाक़ात की थी.
दोनों प्रवक्ता नड्डा से मिलने उनके कार्यालय गए थे. लेकिन इस बार सीजेपी ने शर्त रखी कि वे बातचीत के लिए किसी न्यूट्रल जगह पर मिलेंगे न कि मंत्री के कार्यालय या आवास पर.
यहाँ भी सोनम वांगचुक और सीजेपी की सोच में फ़र्क़ साफ़ दिख रहा है. सोनम वांगचुक बीजेपी मंत्री के हाथों अनशन तोड़ रहे हैं जबकि सीजेपी उनके कार्यालय और आवास पर जाकर बातचीत करने से परहेज कर रही है.
कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदार रहे और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने सोनम वांगचुक के अनशन तोड़ने का स्वागत किया है लेकिन कुछ तीखे सवाल भी पूछे हैं.
योगेंद्र यादव वे सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर कहा, ''जिस आश्वासन के आधार पर सोनम वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ा है, वो तो सिर्फ़ इतना कहता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ केस नहीं बनेगा. भाई शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियो के ख़िलाफ़ तो मुक़दमा बनना ही नहीं चाहिए.''
''तो क्या सरकार तय करेगी कि उन प्रदर्शनकारियों में से कौन से शांतिपूर्ण थे और कौन नहीं थे? जो 11 एफ़आईआर पहले ही हो चुकी हैं, उनका क्या होगा? इसलिए सलाम सीजेपी के उन तमाम युवा नेताओं को जिन्होंने स्पष्ट किया है कि अनशन समाप्त होने का मतलब यह नहीं कि आंदोलन समाप्त हो गया. सोनम वांगचुक ने भी यह नहीं कहा है. आंदोलन जारी रहेगा.''

2023 की एक तस्वीर है, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो के साथ दिखाई दे रहे हैं. अब नए राजनीतिक संदर्भ में इस तस्वीर पर फिर से बात हो रही है.
मार्च 2023 की उस पोस्ट में धर्मेंद्र प्रधान ने इस दंपती के विचारों और शिक्षा में बदलाव लाने की उनकी प्रतिबद्धता की सराहना की थी.
गुरुवार को, जब परीक्षा संबंधी कथित अनियमितताओं के विरोध में वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 26वें दिन में पहुंची, तो यह पोस्ट सोशल मीडिया पर फिर से वायरल होने लगी.
उस समय वांगचुक ने भी उतनी ही गर्मजोशी से प्रतिक्रिया देते हुए धर्मेंद्र प्रधान का कथित इनोवेटिव विचारों के प्रति खुलेपन के लिए धन्यवाद किया था. उन्होंने कहा था कि इस मुलाक़ात के बाद वे नई शिक्षा नीति (एनईपी) को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए "पहले से भी अधिक प्रतिबद्ध" हो गए हैं. हालांकि उस वक़्त भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर सवाल उठ रहे थे.

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सोनम वांगचुक की पॉलिटिक्स क्या है?
सोनम वांगचुक जैसा कोई कैसे बनता है? वांगचुक सरकार से सवाल पूछते हैं लेकिन क्या वह जवाब हासिल करने तक लड़ते हैं?
राजनीतिक विश्लेषक और 'गांधी: द एंड ऑफ नॉन वॉयलेंस' के लेखक मानस फ़िराक़ भट्टाचार्जी ने फ़्रंटलाइन मैगज़ीन में 17 जुलाई को लिखा था, ''एक इंजीनियर के तौर पर उन्होंने सरकारी स्कूल व्यवस्था में सुधार की कोशिश की.''
'वह न तो राज्य-विरोधी विद्रोही हैं और न ही सरकार-विरोधी. वह लोगों को उपदेश देने के लिए सार्वजनिक जीवन में नहीं आए. वह किसी विचारधारा का झंडा लेकर भी नहीं आए. वह एक सक्रिय नागरिक की दृष्टि और प्रतिबद्धता के साथ काम करने आए.''
मानस फ़िराक़ भट्टाचार्जी ने लिखा है, ''सरकारें वांगचुक की तरह नहीं सोचतीं क्योंकि उनकी राजनीति वर्तमान को साधने पर केंद्रित होती है. भविष्य उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना कभी जवाहरलाल नेहरू के लिए था, जिन्होंने अहमदनगर जेल में भारत के भविष्य के बारे में सोचते हुए अनगिनत रातें जागकर बिताईं और कई पन्ने लिखे.''
''लेकिन जो सरकार भविष्य को गंभीरता से नहीं लेती, वह उन लोगों से डरती है जो भविष्य की चिंता करते हैं. यही बात वांगचुक को राजनीतिक बनाती है. उनके पर्यावरण संबंधी संकल्प से राज्य का भय दरअसल उन लोगों की रक्षा करता है जो मानव जीवन और पर्यावरण के ख़िलाफ़ अपराधों के लिए ज़िम्मेदार हैं.''

लद्दाख के एक्टिविस्ट शृंग गाफेल ने एक्स पर लिखा है, ''सोनम वांगचुक की बायोपिक बने, तो उनका किरदार कौन निभाएगा?''
''एक ऐसे व्यक्ति की कहानी, जिसे कभी देशभक्त के रूप में सम्मान मिला और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया, फिर उसी पर "राष्ट्र-विरोधी", "चीनी एजेंट" और "पाकिस्तानी एजेंट" जैसे आरोप लगे. जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) का सामना किया, छह महीने जेल में बिताए, और अब जिसकी सेहत को लेकर भारत के प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से चिंता जता रहे हैं. यह सचमुच एक असाधारण कहानी है. इस पर एक शानदार फ़िल्म बन सकती है.''
राजनीतिक विश्लेषक सबा नक़वी ने एक्स पर लिखा है, ''सोनम वांगचुक का बीजेपी नेताओं की मौजूदगी में अपना उपवास तोड़ना प्रतीकात्मक रूप से कुछ सवाल खड़े करता है. यह आंदोलन पारंपरिक और औपचारिक बातचीत से कहीं आगे की जनभावना और आक्रोश का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे में, जब सरकार ने वांगचुक से मुलाक़ात के अलावा कोई ठोस रियायत नहीं दी है और पुलिस पर पेलेट गन के इस्तेमाल सहित सख्त कार्रवाई के आरोप लगे हैं, तो इस तरह की तस्वीर कई लोगों को सहज नहीं लग सकती.
उन्हें अपना उपवास ज़रूर तोड़ना चाहिए था, लेकिन शायद इस आंदोलन की शुरुआत करने वाले अभिजीत दीपके वहां मौजूद होते और वही उन्हें पहला निवाला खिलाते, तो उसका संदेश अलग होता.''

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कॉकरोच आंदोलन कहाँ जाएगा?
इस आंदोलन की तुलना अतीत के कई आंदोलनों से हो रही है. 1974-75 के जेपी आंदोलन और 2011-13 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, दोनों ही बड़े जन आंदोलनों से कॉकरोच आंदोलन की तुलना हो रही है.
राजनीति विज्ञानी सुहास पलशिकर ने लिखा है, ''कॉकरोच आंदोलन इन दोनों की तुलना में कहीं अधिक असंगठित है और इसकी ताक़त अधिकतर स्वतःस्फूर्त जनभावना और लंबे समय से दबे असंतोष पर टिकी हुई है. इसका फैलाव भी अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर उतना व्यापक नहीं है. हालांकि इसकी गूंज अब दिल्ली से बाहर भी सुनाई देने लगी है.''
''जेपी आंदोलन में धीरे-धीरे संवैधानिक शक्तियों और संविधान को कमज़ोर करने की इच्छा रखने वाली ताक़तों का एक साथ आना देखा गया. यह रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी शक्तियों के साथ-साथ प्रगतिशील और वाम-झुकाव वाले समूहों का भी मेल था.''
''2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरुआत एक विवादित नेतृत्व के साथ हुई. जेपी आंदोलन की तरह इसमें भी परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाली ताक़तें शामिल हुईं, लेकिन अंततः यह आंदोलन उन शक्तियों के प्रभाव में आ गया जिनका मक़सद संवैधानिक लोकतंत्र को पीछे धकेलना था.''
पलशिकर ने लिखा है, ''नतीजतन, जेपी आंदोलन सरकार को तो हरा सका, लेकिन उसके बाद बहुत कुछ नया नहीं दे पाया. उलटे उसने संविधान-विरोधी ताक़तों के सत्ता तक पहुंचने का रास्ता आसान कर दिया. इसके विपरीत, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन राजनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक प्रभावशाली साबित हुआ क्योंकि उसने सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया.''
''अब सवाल है कि कॉकरोच आंदोलन किस दिशा में जाएगा? संभव है कि यह कहीं न पहुँचे. यह लोगों के भीतर के आक्रोश को बाहर आने का अवसर देगा और समय के साथ इसकी ऊर्जा कम हो जाएगी. किसान आंदोलन की तरह यह कुछ उपलब्धियां हासिल कर सकता है, लेकिन धीरे-धीरे इसकी गति भी कम पड़ सकती है.''
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