सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने जिस संदर्भ में धर्म का ज़िक्र किया, उसे लेकर उठ रहे हैं ये सवाल

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सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो पिछले दो हफ़्तों से युवाओं के आंदोलन में काफ़ी मुखर रही हैं.

जंतर मंतर पर भूख हड़ताल के दौरान जब सोनम वांगचुक को 'जबरन' सफ़दरजंग हॉस्पिटल में शिफ़्ट किया गया, तब से गीतांजलि ही अपने पति की योजनाओं और रुख़ को सामने रखती रही हैं.

जब शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिया, तब भी गीतांजलि अपने पति से ज़्यादा मुखर रहीं. इसी दौरान उन्होंने कई ऐसी बातें कहीं, जिनको लेकर उनकी सोच और समझ पर बहस शुरू हो गई है.

गीतांजलि ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद एक्स पर एक पोस्ट लिखी, जिसे लेकर कई लोगों ने आपत्ति जताई.

इस पोस्ट में गीतांजलि ने लिखा है, "अगर किसी ने दुनिया को यह दिखाया है कि भारत का विश्वगुरु होना वास्तव में क्या मायने रखता है, तो वह हमारी जेन ज़ी है."

"उन्होंने सनातन धर्म का केवल उपदेश नहीं दिया, बल्कि उसे अपने आचरण में उतारा है. नफ़रत के बिना साहस. हिंसा के बिना शक्ति. अंधभक्ति के बिना देशभक्ति."

"दुनिया के कई देशों के अपने समकालीन युवाओं के उलट, उन्होंने यह दिखाया है कि अपने ही देश को आग के हवाले किए बिना भी अन्याय के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़ा हुआ जा सकता है."

"शायद अब समय आ गया है कि हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी इन युवाओं से हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विश्वगुरु होने के वास्तविक अर्थ के बारे में कुछ सीखे."

हालांकि, उनके पति सोनम वांगचुक ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद की गई पोस्ट में धर्म-विशेष से जुड़ी कोई बात न लिखकर अहिंसा और लोकतंत्र का ज़िक्र किया.

वांगचुक ने एक्स पर लिखा, "यह लोकतंत्र की जीत है. प्रत्यक्ष लोकतंत्र... सीधे सड़कों से. यह शांति, धैर्य और दृढ़ता की जीत है. सीजेपी, देश की जेन ज़ी को बधाई और उन सभी नागरिकों का शुक्रिया, जिन्होंने डर और डर के डर को पीछे छोड़कर देश के हर कोने से उठ खड़े होने का साहस दिखाया."

सनातन और हिन्दुत्व के ज़िक्र पर बहस

गीतांजलि की इस पोस्ट से कई लोगों ने असहमति जताई और उन्हें लग रहा है कि वह नाहक ही इसे सनातन और हिन्दुत्व से जोड़ रही हैं क्योंकि यह आंदोलन किसी मज़हब या विचारधारा से प्रेरित नहीं था. इस आंदोलन में शामिल लोग किसी एक धार्मिक समूह के नहीं थे.

गीतांजलि की इस पोस्ट पर द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के संपादक नितिन सेठी ने लिखा है, ''बिना किसी उकसावे के, एक ही ट्वीट में अपनी सोच और समझ का ऐसा परिचय देना वाक़ई हैरान करने वाला है.''

ख़ुद को व्यंग्यकार बताने वाले आशीष बागची ने गीतांजलि की पोस्ट पर तंज़ करते हुए लिखा है, ''क्या वह सचमुच इतनी दयनीय रूप से कम जानकारी रखती हैं कि उन्हें लगता है, भारत के जेन ज़ी में केवल सनातन को मानने वाले ही हैं, यानी उसमें मुसलमान, सिख, ईसाई या बौद्ध नहीं हैं?

क्या इसका मतलब यह है कि कोई दूसरा धर्म लोगों को नफ़रत के बिना साहस, हिंसा के बिना शक्ति जैसी बातें नहीं सिखाता?''

भूटान के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द भूटनीज के संपादक तेनज़िंग लामसांग ने गीतांजलि की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है, ''अलोकप्रिय राय हो सकती है, लेकिन मुझे लगता है कि गीतांजलि मैम जितना कम सार्वजनिक टिप्पणियां करें, उतना ही सोनम वांगचुक के लिए बेहतर होगा. भले ही ये टिप्पणियां नेक इरादे से हों.''

''उनके बयानों को कभी कांग्रेस बीजेपी समर्थक बताकर पेश करती है, तो कभी बीजेपी उन्हें कांग्रेस समर्थक बताती है. इससे सीजेपी के लिए भी स्थिति मुश्किल हो जाती है. इस पूरे आंदोलन के सबसे बड़े प्रेरक सोनम रहे हैं और गीतांजलि हर क़दम पर उनका सबसे मज़बूत सहारा बनी रही हैं.''

हालांकि कई सोशल मीडिया यूज़र्स इस आधार पर गीतांजलि का बचाव कर रहे हैं कि उनका संदर्भ हिंदुत्व की राजनीति नहीं, बल्कि अहिंसा, साहस और नैतिक आचरण से था.

धर्म से प्रेरणा?

इतिहासकार रूचिरा शर्मा ने एक्स पर लिखा है, ''यह तो सचमुच देशव्यापी आंदोलन था, जिसमें हर धर्म और हर जाति के युवा सरकार से जवाबदेही की मांग को लेकर एक साथ आए थे. फिर इसे धार्मिक रंग देने की क्या ज़रूरत थी? इसे बहुसंख्यकवाद का रंग क्यों दिया जा रहा है? बिल्कुल बेतुकी बात!''

वहीं ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक संपादक प्रतीक सिन्हा ने सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी पर संदेह जताते हुए लिखा है, ''यह दंपती हर तरह के संदेह के दायरे में है. जिस आंदोलन को मुख्यधारा का मीडिया भी धार्मिक रंग नहीं दे पाया, उसे ये लोग धर्म के चश्मे से देख रहे हैं.''

गीतांजलि अपने जीवन के अनुशासन और तौर तरीक़ों को धर्म से जोड़ती रही हैं.

22 जुलाई को इंडिया टुडे के लिए राजदीप सरदेसाई ने गीतांजलि से उपवास के कारण सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर पूछा तो उसके जवाब में गीतांजलि ने कहा था, ''मैं एक जैन परिवार में पैदा हुई हूँ और मैंने अपनी माताओं, अपनी दादियों, अपने परिवार के सदस्यों को 31, 41, 51 दिनों तक उपवास करते देखा है. मैंने वह देखा है और उससे मुझे ताक़त मिलती है.''

हालांकि भारत में उपवास से जुड़ी कई ऐसी मिसालें हैं, जहाँ हर धर्म के लोगों ने हफ़्तों तक ऐसा किया है. मणिपुर की इरोम शर्मिला इसकी सबसे चर्चित मिसाल हैं और उन्होंने अपने उपवास को मक़सद से जोड़ा था न कि मज़हब से.

ख़ुद को मोदी विरोधी कहे जाने पर कैसा महसूस करती हैं, इस सवाल के जवाब में भी गीतांजलि ने उन्हीं मिसालों का इस्तेमाल किया, जो किसी एक धर्म से जुड़ी हैं.

गीतांजलि ने कहा था, ''इस देश में कृष्ण, बुद्ध और अरविंद जैसे लोग अवतरित हुए हैं. यह देश 10,000 साल से चल रहा है. यह मोदी और धर्मेंद्र प्रधान जैसों के साथ या बिना उनके 10,000 साल और चलेगा."

क्या आदोलन अराजनीतिक होते हैं?

गीतांजलि ने इस आंदोलन को राजनीति से ऊपर बताया है.

राजदीप के साथ बातचीत में गीतांजलि ने कहा, ''मैं चाहती हूँ कि यह आंदोलन राजनीति से ऊपर रहे. हमारे लिए न कोई विपक्ष है, न कोई सरकार. हमारे लिए संसद सबसे बड़ा सदन है, सबसे बड़ी संस्था है, जिसका हम सम्मान करते हैं और हम चाहते हैं कि वह शिक्षा को एक बुनियादी मुद्दे के रूप में देखे. मैंने कई बार कहा है, हम राजनीतिक नहीं हैं.''

हम राजनीतिक नहीं हैं के जवाब में ऑल्ट न्यूज़ के संपादक प्रतीक सिन्हा ने लिखा है, ''हेलो गीतांजलि, क्या आपको और सोनम को लगता है कि यह आंदोलन सिर्फ़ आपका है और इसलिए आप तय करेंगे कि इसे आगे किस दिशा में जाना चाहिए? उसी समय कई दूसरे छात्र भी अनशन पर बैठे थे. क्या आपने उनमें से किसी को इस तरह बात करते सुना, मानो आंदोलन पर उसी का अधिकार हो?''

''और "इसे राजनीतिक मत बनाइए" कहने का क्या मतलब है? क्या इस देश की राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं? वांगचुक तो बीजेपी और उसके नेताओं से बातचीत करने और उनकी मौजूदगी में अपना उपवास तोड़ने में पूरी तरह सहज हैं. फिर आप किन राजनीतिक दलों की बात कर रही हैं, जिन्हें इस आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए? क्या आपका मतलब है कि विपक्षी दलों को इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लेना चाहिए?''

''और विचारधाराएं कब से महत्वहीन हो गईं? क्या गांधी की कोई विचारधारा नहीं थी? क्या नेहरू की कोई विचारधारा नहीं थी? क्या भगत सिंह की कोई विचारधारा नहीं थी? जब बीजेपी और उसके समर्थक प्रदर्शन कर रहे छात्रों को राष्ट्र-विरोधी बता रहे हैं, तो क्या वह किसी विचारधारा का परिणाम नहीं है? राज्यों में बदली जा रही पाठ्यपुस्तकें क्या किसी विचारधारा का परिणाम नहीं हैं? विश्वविद्यालयों में आरएसएस से जुड़े लोगों की नियुक्तियां और उनके ज़रिए विश्वविद्यालयों की दिशा तय करने की कोशिशें क्या किसी विचारधारा का हिस्सा नहीं हैं?

''अगर आप सचमुच छात्रों की चिंता करती हैं, तो आपको यह भी समझना चाहिए कि आज छात्र जिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं, वे उसी विचारधारा का परिणाम हैं, जिसने देश की संस्थाओं और नीतियों पर गहरा प्रभाव डाला है. दरअसल, आज भारत में जो सबसे बुनियादी संघर्ष चल रहा है, वह विचारधाराओं का संघर्ष है.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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