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कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य क्या है और अब वो आगे क्या करेगी?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
धर्मेंद्र प्रधान के केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़े के साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन समाप्त हो चुका है और दिल्ली के जंतर-मंतर पर अब हालात आम दिनों की तरह सामान्य हो गए हैं.
एनडीएमसी के कर्मचारी यहां बीते एक महीने से चल रहे प्रदर्शनों की हर निशानी को मिटाने की कोशिश में लगे हैं.
एक तरफ़ दीवारों पर लिखे गए स्लोगन्स हटाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ यहां सड़कों की भी साफ़-सफ़ाई की गई है.
इसके साथ ही सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके और इनके समर्थक भी जंतर-मंतर से वापस जा चुके हैं.
तो क्या कॉकरोज जनता पार्टी और इसका मक़सद पूरा हो चुका है? क्या भारत की राजनीति में एक महीने तक सुर्खियों में रही सीजेपी अब चर्चा से ग़ायब हो जाएगी या इसका कोई भविष्य भी है?
इस कहानी में हम कुछ एक्सपर्ट्स से बातचीत के आधार पर जानने की कोशिश करेंगे कि सोशल मीडिया पर एक व्यंग्य के ज़रिए बना जेन ज़ी का यह प्लेटफॉर्म क्या आने वाले दिनों में भी अपना असर दिखा सकता है?
क्या होगा सीजेपी का भविष्य
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन पूरी तरह से गैर-राजनीतिक नज़र आया. हालाँकि उनके मंच पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, शिव सेना (उद्धव ठाकरे गुट), एनसीपी (शरद पवार गुट) जैसे कई सियासी दलों के नेता नज़र आए.
इसके साथ ही फ़िल्म और खेल से जुड़ी कई हस्तियों को भी सीजेपी के साथ खड़ा देखा गया.
जेएनयू में सेंटर फ़ॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर डॉक्टर सुधीर कुमार कहते हैं, "सीजेपी ने लंबे समय की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बारे में कुछ कहा नहीं है लेकिन जो अभी तक उनकी शैली रही है, उससे नहीं लगता कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है."
डॉक्टर सुधीर कुमार के मुताबिक़, "महत्वपूर्ण बात है कि शिक्षा को लेकर दिल्ली में पिछले दस सालों में स्टूडेंट्स के बहुत सारे आंदोलन हुए और जब वो थकान महसूस कर रहे थे, इस आंदोलन ने उनमें एक जान फूंकी है."
डॉक्टर सुधीर कुमार ने कहा, "इस आंदोलन में कुछ ख़ास प्रगति हुई हैं. राजनीतिक पार्टियों ने बहुत तेज़ी से आंदोलन की मांगों को एजेंडे पर लेना शुरू कर दिया है. पुलिस कार्रवाई, लोगों की हिरासत और एफ़आईआर को लेकर विपक्षी पार्टियां बहुत तेज़ी से एक्शन में आई हैं."
तो क्या कॉकरोच जनता पार्टी की प्रमुख मांगें मान लिए जाने के बाद यह आंदोलन और सीजेपी अब ख़त्म हो जाएगी?
वरिष्ठ पत्रकार और किसी समय आम आदमी पार्टी के सदस्य रहे आशुतोष कहते हैं, "मुझे लगता है कि सीजेपी ने एक ऐतिहासिक भूमिका निभा दी है और उन्होंने एक रास्ता दिखाया है कि नरेंद्र मोदी जैसे ताक़तवर नेता को झुकाया जा सकता है और एक मंत्री का इस्तीफ़ा लिया जा सकता है."
"अगर कोई यह सोचता है कि सीजेपी फिर किसी मुद्दे पर सड़क पर उतरेगी तो ऐसा नहीं होगा और न ही वह कोई पॉलिटिकल पार्टी बनने वाली है. यह अच्छा भी रहेगा क्योंकि इससे आंदोलन की गरिमा और उसकी मर्यादा नष्ट होती है. पूरी दुनिया ने देखा कि आम आदमी पार्टी का बाद में क्या हश्र हुआ है."
युवाओं के आंदोलन का संदेश
पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं, "आंदोलन से ही राजनीतिक दल निकलते हैं. आप देखेंगे कि 1974 का आंदोलन भी 'छात्र संघर्ष वाहिनी' कर रही थी. बाद में इसी से जनता पार्टी निकली और उन्होंने केंद्र में इंदिरा गांधी को हराया. फिर छात्र आंदोलन के नेताओं ने ही कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को हटाया."
डीएम दिवाकर का कहना है, "सीजेपी कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है, लेकिन इनका एजेंडा पॉलिटिकल है. आप उनके बयानों को देखेंगे तो वे व्यवस्था में सुधार और बीजेपी को हटाने जैसी बात करते हैं. मुझे लगता है कि सीजेपी जेन ज़ी को साथ लेकर एक अपकमिंग (आने वाले समय की) पॉलिटिकल पार्टी है."
डीएम दिवाकर कहते हैं, "भले ही 1974 में छात्रों ने ख़ुद जेपी से कहकर उन्हें अपना नेता बनाया था, लेकिन आप ध्यान दें तो आम आदमी पार्टी में भी कोई नेता नहीं था, जिनके पास कोई राजनीतिक अनुभव हो. लेकिन वे राजनीतिक रूप से सफल हुए."
वह कहते हैं, "सोनम वांगचुक पढ़े लिखे हैं. वह अच्छे सोशल मोबिलाइज़र हैं और दूरदर्शी भी हैं, लेकिन वह जेपी नहीं हैं और यह एक कमी मुझे जेन ज़ी के आंदोलन में दिखती है. लेकिन संभव है कि सीजेपी के सदस्यों में ही कोई एक नेता बन जाए."
भारत में हाल के समय में सबसे नई और सफल पॉलिटिकल पार्टी की बात करें तो यह 'आम आदमी पार्टी' है. भ्रष्टाचार ख़त्म करने के नाम पर चल रहा एक आंदोलन राजनीतिक दल में बदल गया.
हालाँकि इनके नेता भी शुरू में इस बात से इनकार करते थे कि उनके आंदोलन के पीछे कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, जबकि उनका आंदोलन कई महीनों तक चलता रहा.
ऐसे में महज़ कुछ हफ़्ते पुराने सीजेपी के आंदोलन को लेकर भविष्यवाणी करना बहुत आसान नहीं होगा.
'कॉकरोच' सिंबल
डॉक्टर सुधीर कुमार मानते हैं कि यह सीजेपी से ज़्यादा भी बड़े फ़्यूचर यानी भारत के स्टूडेंट्स का मूवमेंट था.
उनका कहना है, "इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण बात है 'कॉकरोच' का सिंबल, क्योंकि यह सिंबल हमारी राजनीति में बहुत अलग है. कॉकरोच को हमारे समाज में बहुत अलग तरह से देखा जाता है."
"धरना-प्रदर्शन समाप्त करते हुए अभिजीत दीपके ने कहा कि 'आप समझ सकते हैं कि कॉकरोच क्या कर सकते हैं.' जो कि एक बड़ा संदेश है. जिन्हें समाज में दबा कुचला समझा जाता है, जिन्हें हाशिए पर समझा जाता है, यह उनकी आवाज़ की ही गूंज है."
डॉक्टर सुधीर कुमार का मानना है कि युवाओं को केवल वोट देने का अधिकार नहीं चाहिए, बल्कि उन्होंने बताया है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए और जब भी उन्हें लगेगा कि उस भूमिका को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है तो वे सड़कों पर उतर कर उस भूमिका को पाने की कोशिश कर सकते हैं.
डॉक्टर सुधीर कुमार की इस बात से आशुतोष भी सहमत दिखते हैं.
आशुतोष ने कहा, "सीजेपी के आंदोलन ने जेन ज़ी के अंदर एक लोकतांत्रिक चेतना स्थापित की है. लोग कहते थे कि आज के युवा मीम बनाने और सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं, लेकिन लोगों का यह भ्रम टूटा है और जेन ज़ी ने दिखा दिया है कि ज़रूरत पड़ेगी तो वे सड़क पर भी उतरेंगे."
उनका कहना है, "युवाओं ने एक निरंकुश सरकार को लोकतांत्रिक रास्ते पर लौटने को मजबूर किया है. किसने सोचा था कि अमेरिका से आकर एक लड़का इस तरह से आंदोलन खड़ा कर देगा कि देश के प्रधानमंत्री को रात के 12 बजे रील बनाना पड़ेगा."
सोशल मीडिया का असर
सीजेपी को पूरी तरह से सोशल मीडिया के असर से पैदा एक आंदोलन माना जाता है. इसकी शुरुआत भी सोशल मीडिया से हुई थी.
दरअसल 15 मई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत सीनियर वकील का दर्जा दिए जाने की मांग संबंधी एक वकील की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.
इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका पर बढ़ते 'अनुचित हमलों' को लेकर कड़ी टिप्पणी की.
जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा, "कुछ युवा ऐसे हैं, जो रोज़गार नहीं मिलने और पेशे में जगह न बना पाने के कारण कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं. उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं, कुछ दूसरे तरह के एक्टिविस्ट बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं."
हालाँकि 16 मई को उन्होंने कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने उनकी बातों को ग़लत तरीके से पेश किया.
लाइव लॉ और बार एंड बेंच के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणियां केवल उन लोगों के ख़िलाफ थीं, जिन्होंने फ़र्ज़ी या नकली डिग्रियों के सहारे वकालत जैसे पेशों में प्रवेश किया है, न कि सामान्य रूप से युवाओं के ख़िलाफ़.
लेकिन तब तक उनकी टिप्पणी से सोशल मीडिया पर 'कॉकरोच' शब्द को लेकर कई लोगों ने चर्चा शुरू कर दी थी. इस चर्चा के केंद्र में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) रही.
इंटरनेट पर इसके नाम से वेबसाइट बन गई और इंस्टाग्राम पर इसके लाखों फॉलोअर्स हो गए.
यहीं से शुरू हुई सीजेपी की ओर से नीट पेपर लीक पर चर्चा और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग. उन्होंने इस मांग के साथ पहली बार 6 जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया फिर भारत के कई अन्य शहरों में भी प्रदर्शन किए.
आख़िरकार उन्होंने 20 जून से जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू कर दिया, जिसका अंजाम 25 जुलाई, शनिवार को देखने को मिला, जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
डॉक्टर सुधीर कुमार कहते हैं, "यह आसान नहीं होता है, एक महीने तक घर छोड़ कर बाहर रहना, मां बाप का दबाव, पढ़ाई का दबाव, करियर का दबाव. अगर सीजेपी अपने अन्य मुद्दों को आगे नहीं भी बढ़ा पाती है तो उसे विपक्षी दलों ने उठाया है."
उनका मानना है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक दल उन मुद्दों को कैसे उठाते हैं, यह देखना काफ़ी दिलचस्प होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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