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नरेंद्र मोदी जिस राजनीति के लिए नहीं जाने जाते हैं, वो उन्हें क्यों करनी पड़ी?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक करियर में नाकामी न के बराबर देखी है.
अक्तूबर 2001 में मोदी विधायक भी नहीं थे और बीजेपी ने उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया था.
मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने चुनावी राजनीति में क़दम रखा. मोदी फ़रवरी 2002 में राजकोट-2 से विधानसभा उपचुनाव जीते थे. यह मोदी के राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव था.
तब जीत का अंतर 14,700 वोट था. यह नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन की सबसे कम अंतर की जीत थी. मोदी मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे फिर प्रधानमंत्री बन गए.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की पहली बार और भारत में 1984 के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी.
2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का चरम था क्योंकि बीजेपी ने उनके नेतृत्व में 303 सीटें जीती थीं, जो कि 2014 की 282 सीटों से ज़्यादा थीं. 2024 के आम चुनाव में मोदी की पकड़ ढीली पड़ी और बीजेपी 240 सीटों पर सिमट कर रह गई.
2001 से लेकर अब तक नरेंद्र मोदी की राजनीति को देखें तो सत्ता बहुत केंद्रीकृत रही है. विपक्ष का दबाव न के बराबर रहा है.
ऐसे विरले मामले ही हैं, जब नरेंद्र मोदी को अपना क़दम पीछे खींचना पड़ा हो. 2002 के गुजरात दंगे में बहुत दबाव था कि नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दें लेकिन वो दबाव भी उस हद तक नहीं पहुँच पाया.
नरेंद्र मोदी के 'औरा' को चुनौती
लेकिन 37 दिनों तक दिल्ली के जंतर मंतर पर चले जेन ज़ी के आंदोलन से मोदी के 'औरा' (आभामंडल) को कड़ी चुनौती मिली और उनके शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा. मोदी का मंत्री बाहरी दबाव में इस्तीफ़ा दे ये उनकी राजनीतिक शैली से मेल नहीं खाता है.
इसे प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक स्थिति के लिए एक अहम झटके के रूप में देखा जा रहा है.
जल्द ही उन्हें उत्तर प्रदेश के अहम चुनाव का सामना करना है, जहाँ युवाओं के लिए रोज़गार का मुद्दा बड़ी संख्या में मतदाताओं की प्रमुख चिंता है. इसके अलावा पंजाब और उत्तराखंड में भी चुनाव हैं.
'नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स' के लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "यह मोदी की बहुत बड़ी हार है. यह उनकी उस छवि के लिए भी बड़ा झटका है, जिसे एक सख़्त, जनप्रिय और मज़बूत नेता के रूप में गढ़ा गया था."
क़रीब एक महीने पहले शुरू हुआ यह आंदोलन 20 जुलाई को उस समय उग्र हो गया, जब पुलिस ने छात्रों को संसद की ओर मार्च करने से रोकने के लिए आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया.
इस हिंसा की तस्वीर तेज़ी से सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में फैल गई. इसके बाद आम लोगों में छात्रों के प्रति व्यापक सहानुभूति पैदा हुई. बॉलीवुड के कई कलाकारों ने भी उनका समर्थन किया, जबकि पुलिस की कार्रवाई की व्यापक आलोचना हुई.
विपक्षी सांसद भी छात्रों के समर्थन में उतर आए. उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग करते हुए संसद की कार्यवाही बाधित की. सप्ताह के अंत तक यह आंदोलन पटना, मुंबई और कोलकाता सहित देश के कई बड़े शहरों में फैल चुका था और हज़ारों युवा सड़कों पर उतर आए थे.
क्या समर्थक ही बने विरोधी?
शनिवार को जंतर मंतर पर जब शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की ख़बर पहुँची, तो छात्रों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि देश का युवा अब जाग चुका है और वह आगे भी बदलाव के लिए संघर्ष जारी रखेगा.
यह पहली बार नहीं था जब मोदी सरकार को जनदबाव के आगे झुकना पड़ा हो.
2021 में भी उत्तर भारत के हज़ारों किसानों के महीनों चले लंबे आंदोलन के बाद सरकार को विवादास्पद कृषि क़ानून वापस लेने पड़े थे. लेकिन इस बार प्रदर्शनकारियों ने कुछ ही दिनों में सरकार को क़दम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया.
विश्लेषकों के अनुसार मोदी के लिए इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि प्रदर्शनकारियों का ग़ुस्सा अब केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रहा.
इस आंदोलन में व्यापक असंतोष दिखा, जिसमें ग्रैजुएट्स के बीच बढ़ती बेरोज़गारी और देश की 37 करोड़ युवा आबादी के लिए सम्मानजनक बेहतर वेतन वाली नौकरियों की कमी जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.
येल यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई अध्ययन के अध्यापक सुशांत सिंह ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनेंशियल टाइम्स से कहा, "इन प्रदर्शनों का निशाना अब मोदी बन चुके हैं. इस भीड़ में बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जिन्होंने मोदी को वोट दिया था. मोदी ने उनसे बहुत सारे वादे किए थे. मुझे लगता है कि उन्हें महसूस हो रहा है कि मोदी ने उनके भरोसे को तोड़ा है और अपने वादे पूरे नहीं किए."
इस साल अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के यूथ लेबर मार्केट स्टडी के अनुसार, 15 से 25 आयु वर्ग के लगभग 40 प्रतिशत ग्रैजुएट बेरोज़गार हैं. जिनके पास रोज़गार है, उनमें भी केवल एक छोटा हिस्सा नियमित वेतन वाली नौकरियों में है और उससे भी कम लोगों को सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं मिलती हैं.
चुनाव में भी असर होगा?
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "मुझे लगता है कि बीजेपी समझ ही नहीं पाई कि युवाओं से कैसे निपटा जाए. यह पीढ़ी बीजेपी से अब तीखे सवाल पूछ रही है और डरने से इनकार कर रही है. मैंने पहली बार 16, 17, 18 और 19 साल के युवाओं में प्रधानमंत्री, वरिष्ठ मंत्रियों और सरकार के प्रति इतना ग़ुस्सा देखा है.''
''मैंने पहले कभी किसी भारतीय प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ इस तरह का आक्रोश नहीं देखा. इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की खिल्ली उड़ाई गई थी लेकिन इस तरह से नहीं. युवा नारा लगा रहे थे- 'जब जब मोदी डरता है, हिन्दू-मुस्लिम करता है.' ये सब पहली बार मैंने देखा."
युवाओं की इस चुनौती के बावजूद क्या यह मान लेना चाहिए कि मोदी राजनीतिक रूप से कमज़ोर हो रहे हैं? सिर्फ़ दो महीने पहले ही बीजेपी ने पश्चिम बंगाल, जो भारत का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, में पहली बार जीत हासिल की.
अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है, इसलिए मोदी के पास मतदाताओं के सामने दोबारा जाने से पहले युवाओं की नाराज़गी को कम करने के लिए पर्याप्त समय है.
क्या नरेंद्र मोदी युवाओं की नाराज़गी कम कर पाएंगे?
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि समय तो है लेकिन सरकार अभी भी गंभीर नहीं दिख रही है.
वो कहते हैं, ''धर्मेंद्र प्रधान की जगह मोदी ने शिक्षा मंत्रालय की जिसे ज़िम्मेदारी दी है, वो उनकी गंभीरता को नहीं दिखाता है. जिस व्यक्ति को शिक्षा सचिव बनाया गया है, वो भी इनकी गंभीरता को नहीं दिखाता है. इन दोनों पर कई तरह के गंभीर आरोप हैं.''
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े में सीजेपी जीत देख सकती है लेकिन प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी मिलने को कैसे देखना चाहिए?
लेखक और इतिहासकार मुकुल केसवन कहते हैं, ''ये तर्क वाजिब है कि एक आरएसएस वाले व्यक्ति के बदले दूसरे आरएसएस वाले व्यक्ति को आने में जीत कैसी है? प्रह्लाद जोशी की टिप्पणियां तो रेप को लेकर बहुत ही घटिया रही हैं. लेकिन मैं इसे इस रूप में नहीं देख रहा हूँ. यह एक प्रतीकात्मक जीत है और जब सत्ता इतनी मज़बूत हो सिंबॉलिक जीत भी मायने रखती है.''
मुकुल केसवन कहते हैं, ''यह आंदोलन सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं था. अहसास कराने के लिए था कि लोग अपनी आवाज़ उठा सकते हैं और सरकार से सवाल पूछ सकते हैं. और आवाज़ इतनी ऊंची कर सकते हैं कि सुनना ही पड़ेगा. इस लिहाज से ये आंदोलन की जीत है.''
येल यूनिवर्सिटी के सुशांत सिंह ने एफ़टी से कहा, "भारत के आर्थिक मॉडल को लेकर कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब देना ज़रूरी है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि मोदी इतने लंबे समय से सत्ता में हैं. ऊंची आर्थिक विकास दर के आंकड़े अब तक उस तरह के रोज़गार के अवसर, सामाजिक प्रगति और आर्थिक उन्नति में तब्दील नहीं हो पाए हैं, जिसकी भारत को ज़रूरत है."
इस आंदोलन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति को लेकर भीतर ही भीतर पनप रहे असंतोष का स्पष्ट संकेत दिया.
क़रीब 7 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर ने भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल तो कर दिया है, लेकिन हर साल वर्कफोर्स में शामिल होने वाले लाखों ग्रैजुएट्स के लिए पर्याप्त रोज़गार पैदा करने में देश अब भी संघर्ष कर रहा है.
राजनीति विज्ञानी रामू मणिवन्नन ने अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से कहा, ''यह अभी स्पष्ट नहीं है कि विपक्षी दल, ख़ासकर राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी, सड़कों पर दिख रहे इस ग़ुस्से को चुनावी जीत में बदल पाएंगे या नहीं.''
उन्होंने कहा कि हाल के विधानसभा चुनावों, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में बीजेपी की भारी जीत, यह दिखाती है कि इस मामले में पीछे हटने के बावजूद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अब भी विपक्ष पर मज़बूत बढ़त बनाए हुए है.
मद्रास यूनिवर्सिटी के राजनीति और लोक प्रशासन विभाग के पूर्व अध्यक्ष रहे मणिवन्नन ने कहा, "छात्रों के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन और पुलिस हिंसा ने सरकार को अलोकप्रिय बना दिया. नरेंद्र मोदी को राजनीतिक रूप से अलग-थलग और डिफेंसिव स्थिति में पहुंचा दिया है."
भारत के युवा गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं. देश के कुल बेरोज़गारों में हर पाँच में से चार लोग 30 वर्ष से कम उम्र के हैं. और भी चिंताजनक बात यह है कि ग्रैजुएट्स में बेरोज़गारी की दर निरक्षरों की तुलना में नौ गुना अधिक है.
दूसरी ओर वास्तविक मज़दूरी लगभग स्थिर बनी हुई है. सरकारी कौशल विकास कार्यक्रम भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं. पिछले एक दशक में जिन 1.6 करोड़ लोगों को प्रशिक्षण दिया गया, उनमें से केवल 15 प्रतिशत को ही रोज़गार मिला.
भारत की प्रतिष्ठित आईटी कंपनियां भी इंजीनियरों की छंटनी कर रही हैं और नई भर्तियां रोक रही हैं. 2025-26 वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में इस क्षेत्र की पाँच सबसे बड़ी कंपनियों ने कुल मिलाकर केवल 17 कर्मचारियों की भर्तियां की हैं.
पिछले एक दशक से युवाओं के सहारे ही मोदी ने अपना राजनीतिक आधार तैयार किया था. उन्होंने हर वर्ष दो करोड़ नौकरियां देने, 100 नए शहर बसाने, बुनियादी ढांचे में सुधार करने, भ्रष्टाचार ख़त्म करने और एक नया मध्य वर्ग तैयार करने का वादा किया था. लेकिन 12 साल बाद युवा इन वादों को लेकर अब सवाल पूछ रहे हैं.
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